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Sunday, June 20, 2010

छतहार के फनकार- मनोज मिश्र

यूं तो छतहार की धरती ने कई फनकार पैदा किए, लेकिन जो शोहरत और कामयाबी मनोज मिश्र ने हासिल की वो काबिलेतारीफ है। छतहार के फनकारों की कोई भी सूची मनोज जी के जिक्र के बगैर अधूरी होगी। चाहे वो गज़ल गायिकी हो या फिर लोकगीत, मनोज जी को दोनों में महारत हासिल है। जिंदगी की दूसरी जिम्मेदारियों की वजह से पिछले पंद्रह साल से वो गीत-संगीत से दूर हैं, लेकिन उन्होंने हमसे वादा किया है कि वो अब गीत-संगीत से अपना वनवास तोड़ेंगे। हमारी दुआ उनके साथ है। तहे दिल से हम दुआ करेंगे छतहार का जो चमकता संगीत सितारा अचानक बादलों में घिर गया था वो फिर धूमकेतु की तरह चमके।
यहां पेश है एक गजल और दो लोकगीत जिसे मनोज जी ने ना सिर्फ स्वर दिया है बल्कि संगीत भी दिया है। ये गीत कश्ती के मुसाफिर अलबम से है, जो नए दशक की शुरुआत में बिहार में बेहद लोकप्रिय रहा था। गीतकार हैं ज्योतिंद्र नाथ मिश्र और गायन में मनोजजी का साथ दिया है प्रियंका गहरबार ने।

चांदनी रात में हर फूल मुस्कुराया है
ऐसा लगता है, बहारों ने सर उठाया है
हसीन लम्हों से भरी आंखें, इस तरह अपनी
दर्द सीने से उतर सरजमीं पे आया है
आप हैं चांद है चांदनी रात है
बात करते रहें तो क्या बात है।
आइये दो कदम हम मिलके चलें
पा पा पा मा मा मा गा गा गा रे रे रे
गा गा गा रे रे रे सा पा धि ना सा सा नि सा सा
नि रे रे नि सा सा पा धा नि सा सा पा धा नि सा सा
आइये दो कदम हम मिल कर चलें
फिर भटकते रहें तो क्या बात है।
आप हैं चांद है....
सुलगते हुए एक जंग से हम
गुजरते रहें तो क्या बात है
आप हैं चांद है...
जिंदगी दर्द का दूसरा नाम है
पा पा पा मा मा मा गा गा गा रे रे रे
गा पा गा पा गा रे सा
जिंदगी दर्द का दूसरा नाम है
मुस्कुराते रहें तो क्या बात है
आप हैं चांद है

साल २००० में कश्ती के मुसाफिर अलबम की रिकार्डिंग के दौरान पटना स्टूडियो में ली गई तस्वीर। सामने की पंक्ति में बाएं से चौथे हैं मनोज मिश्र। उनकी बायीं तरफ गायिका प्रियंका जबकि उनके ठीक पीछे खड़े हैं गीतकार ज्योतिंद्रनाथ मिश्र।
अंगिका गीत- गोरी के शान
गीतकार- ज्योतिंद्रनाथ मिश्र
गायक और संगीतकार- मनोज मिश्र
पटना दूरदर्शन पर ये गीत 2005 में प्रसारित हो चुका है
(ये गांव के एक पति के दिल का दर्द है, जिसकी पत्नी के पास रूप तो है लेकिन गुण नहीं)
तोरा ऐसन शान गे गोरकी, कत्ते के देखलियै
ऐसन तीर कमान गे गोरी कत्ते के देखलियै
बोली तोर तबल दूध सन, देलकैय जीभ जराय
सउसे मुंह में फोंका होय गेल, तरुवो गेलै छिलाय
मुंह में रखनै पान गे गोरकी कत्तै के देखलियै
ऐसन तीर कमान गे गोरी कत्ते के देखलियै
तोरा ऐसन...
ऐना कंघी आगू रहै छौ, पीछू सुनै छैं बात
डबकते डबकते जरी गेलौ, फेरु भंसा के भात
ऐसन तीर कमान गे गोरकी...
रंग बिरंगा सारी किनैय छैं, फटलै हमरो जुत्ता
बढ़लै ढाड़ी बाल देखी के, पीछू भूंके कुत्ता
मधुर मधुर मुस्कान गे गोरकी कत्तै के देखलियै
तोरा ऐसान शान गोरी के
रात रात भर जागल रहै छी, लागौ तोरा नींद

खटिया चढ़ी के मचकै छें तों, हमरा मिलल जमीन
ऐसन तीर तमान...
सोलह सोमबारी के फल छौ, ऐसन मिललौ दूल्हा
गोतनी के साथ तों टीवी देखैं छैं, हम्में फूकौं चूल्हा
मधु-मधुर मुस्कान गे गोरकी...

1992 में दुमका, एंड के शारदा संगीत महाविद्यालय में कार्यक्रम पेश करते मनोज मिश्र
गीत- डर लागै
गीतकार- ज्योतिंद्र नाथ मिश्र
गायक और संगीतकार- मनोज मिश्र
(नौकरी के लिए शहर जा रहे पति को उसकी बीवी किस तरह रोकती है उसकी बानगी है ये लोकगीत)

डर लागै हो सैंया डर लागे
तोरा सूनी रे मड़ैय़ा में डर लागे
पति कहता है-
जिसके पूरे घर में भरा पूरा परिवार हो उसे डर कैसे
तुम्हारी सासु मां हैं प्यारी ननद है छबीले देवरजी हैं फिर डर कैसा?
पत्नी बोलती है
सासु हमारी बड़ी है पुरानी, दिनभर मांगे हुक्का पानी
बतिया उनकी जहर लागे
तोरा सुनी रे मड़ैया में डर लागे
कुंवारी ननदिया के लंबी-लंबी केसिया
हंसे जैसे हंसुआ के धार जैसन हसिया
दिन दुपहरिया कहर लागे
तोरा सूनी रे मड़ैया में डर लागे
छैल छबीला मोरा बांका देवरवा
हमको जगायके खेले सतघरवा
अंखिया मारे हो हो हो
अंखिया मारे नजर लागे
तोरा सूनी रे मड़ैया में डर लागे
अब ना रहबै हम तोहरी अटरिया
ले लैयो सैंया झोरी गठरिया
दुश्मन सारा हो हो हो
दुश्मन सारा शहर लागे
तोरा सूनी रे मड़ैया में डर लागे

Saturday, June 12, 2010

मदमस्त के बहे बयार महिनवा फागुन के

मदमस्त के बहे बयार महिनवा फागुन के
बाटे रे बटोहिया तोहिं मोरो भैया
लेले जाहो हमरो संदेश, महिनवा फागुन के
मदमस्त के बहे बयार महिनवा फागुन के
सबके बलमुआं घर घर घूमे
हमरो बलमू परदेस, हे हो
हमरो बलमू परदेस महिनवा फागुन के
मदमस्त के बहे बयार महिनवा फागुन के
तोहरो बलमुआं के चिन्हियो ना जानियो
कैसे के कहब संदेश हे हो
कैसे के कहब संदेश महिनवा फागुन के
मदमस्त के बहे बयार महिनवा फागुन के
सबके बलमुआं के लंबी लंबी केशिया
हमरे के पगिया निशान, महिनवा फागुन के
मदमस्त के बहे बयार महिनवा फागुन के

- बेशक ये मौसम फागुन का नहीं है, लेकिन अगर आप अपनों से दूर रहते हैं तो जेठ में भी ये फागुन जैसा असर करता है। सबके बलमुआ घर-घर घूमे, हमरो बलमुआ परदेस.... यहां बलमुआ की जगह किसी अपने को रख कर देखिये, जिसे अ्पने प्यारे गांव छतहार से दूर बैठे आप मिस कर रहों तो ये गीत आपके मन की संवेदना के तार को झंकृत कर देगी।
होली का ये सुंदर गीत हमें भेजा है श्री मनोज मिश्र ने। मनोज जी छतहार के जाने-माने गायक और संगीतकार हैं। संप्रति बरौनी के आईओसीएल रिफाइनरी में सर्विस इंजीनियर पद पर कार्यरत हैं। मनोज जी से हम उम्मीद करेंगे कि आगे भी वो अपनी रचना और छतहार के गीत-संगीत के माहौल के साथ वहां के कालजयी कलाकारों के बारे में अपना लेख भेजने की कोशिश करेंगे।- मॉडरेटर

Sunday, June 6, 2010

छतहार के आस्था केंद्र

छतहार और आसपास के इलाके के लोगों के धार्मिक आस्था का अहम केंद्र शिवाला। शिवाला का निर्माण करीब १९३४ ईस्वी का बताया जाता है। छतहार के मशहूर वैद्याचार्य पंडित गोरेलाल मिश्र ने इस मंदिर का निर्माण कराया था। वर्तमान में उनके वंशज इसकी देखभाल करते हैं। इस मंदिर की खासियत एक साथ मां काली, भगवान शिव और उनके परिवार तथा भगवान सूर्य का मंदिर। इलाके भगवान भास्कर का ये अकेला मंदिर है।
मां काली मंदिर का एक दृश्य।
मां तिलधिया महारानी। मां दुर्गा का ये मंदिर बिहार के जाने-माने मंदिरों में शुमार है। कहा जाता है कि यहां जो भी सच्चे मन ने मांगता है, उसकी मुराद जरूर पूरी होती है। प्रत्येक मंगल और शनिवार को यहां बड़ी तादाद में भक्त जुटते हैं। दुर्गापूजा के वक्त तो दूर-दूर से श्रद्धालु यहां माता के दर्शन करने और मन्नत उतारने आते हैं।
प्रेमनाथ बाबा। नदी के पार तड़बन्ना के पास, जहां कभी गांव की क्रिकेट टीम खेला करती थी।
शीतला मंदिर।
शीतला मंदिर।
कालिनाथ स्थान, सिंघिया।
नोट- छतहार में धार्मिक आस्था के केंद्र और भी हैं। विषहरी स्थान, जलपा महारानी मंदिर, बजरंगल बली मंदिर, सत्ती स्थान, हरटोल बाबा स्थान, प्रेमनाथ बाबा शिवालय। अगर इनकी तस्वीरें आपके पास हैं तो हमें इस पते पर भेजिये- hkmishra@indiatimes.com

Sunday, May 30, 2010

मिलिये छतहार के टॉपर से

छतहार से अच्छी खबर। मैट्रिक परीक्षा के नतीजे आ गए हैं। इस बार छतहार के टॉपर रहे शशिकांत मिश्र सुपुत्र प्रो. रजनीकांत मिश्र। आदर्श उच्च विद्यालय तारापुर के छात्र शशि ने ५०० में ४०६ अंक हासिल किए। इसी तरह प्रेम कुमार पुत्र श्री प्रीतम राय ने ५०० में ३९८ अंक हासिल कर प्रथम श्रेणी से मैट्रिक परीक्षा पास की। हम शशि और प्रेम के उज्ज्वल भविष्य की कामना करते हैं।

Friday, May 28, 2010

मेरे बाबूजी

जब भी छतहार के अमर विभूतियों की बात आएगी स्वर्गीय श्री महेंद्र मिश्र के बगैर वो अधूरी ही कहलाएगी। श्री महेंद्र मिश्र, जिन्हें लोग प्यार और आदर से ‘मग’ जी बुलाते थे, हिन्दी साहित्य और आयुर्वेद के प्रकांड पंडित थे। वो राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर के समकालीन थे। बहुत कम लोगों को पता होगा वो दिनकर जी के गुरु सरीखे थे। लेकिन जिंदगी के प्रति फकीरों वाला अंदाजा, पैसे और प्रसिद्धि को लेकर बेरुखी की वजह से वक्त के साथ ‘मग’ जी गुमनाम हो गए। रही सही कसर अग्निकांड ने पूरी कर दी, जिसमें उनकी रचनाएं जलकर खाक हो गईं। हमने उनकी स्मृतियों को जिंदा करने की कोशिश की है। हम पेश कर रहे हैं ‘मग’ जी यादें उनके ज्येष्ठ सुपुत्र श्री निर्मल कुमार मिश्र की जुबानी, जो खुद भी हिन्दी और अंग्रेजी साहित्य के विद्वान हैं। तमाम पाठकों से हमारी गुजारिश है कि अगर ‘मग’ जी को लेकर उनके पास कोई यादें या उनकी कोई रचना हो तो हमसे साझा करें क्योंकि छतहार के इस अमूल्य धरोहर को जिंदा रखने का काम हम नहीं करेंगे तो कौन करेगा। -मॉडरेटर

कहां से शुरू करूं कहां खत्म करूं। बाबूजी का व्यक्तित्व ही ऐसा था जिसे थोड़े में सहेजना मुश्किल है। फिर भी कोशिश करता हूं। शुरुआत गंगा से, जिसके बगैर बाबूजी की याद पूरी नहीं हो पाएगी। सन 1930 से 1960 तक ‘मग’ जी की ख्याति चरमसीमा पर थी। यह वो काल था जब सुल्तानगंज से प्रकाशित मासिक पत्रिका गंगा की स्पर्धा तत्कालीन विख्यात मासिक पत्रिका वीणा, हंस, चांद, पांचजन्य इत्यादि पत्रिकाओं से चल रही थी। हर घर में रामायण की तरह संजो कर रखी जाती थी गंगा। आज भी गंगा पत्रिका की पुरानी प्रति बहुत से घरों में धरोहर की तरह सुरक्षित हैं। बनैली के राजा, जिनका गढ़ सुल्तानगंज में था, के संरक्षण में यह पत्रिका फल-फूल रही थी कि राजा के आकस्मिक निधन ने गंगा की धारा को ही लुप्त कर दिया।
गंगा के प्रमुख संपादक श्री राहुल सांस्कृत्यायन, श्री शिवपूजन सहाय थे। इनके जाने के बाद गंगा के संपादन का भार मेरे बाबूजी यानी ‘मग’ जी पर पड़ गया। गंगा से प्रकाशित वेदांक, पुरातत्वांक, चरित्रांक व विज्ञानांक आज भी शोध करने वाले छात्रों के लिए अमूल्य निधि हैं। इसके प्रकाशन में ‘मग’ जी का योगदान स्तुत्य है। ‘मग’ जी ने राहुल सांस्कृत्यायन के सहयोग से पुरात्वांक क्या निकाला विदेशी विद्वान इससे बहुत प्रभावित हुए। हाल ही में दैनिक हिन्दुस्तान ने पुरातत्वांक की संपूर्ण सामग्री धारावाहिक के रूप में प्रकाशित की। इसमें बाबूजी के लेख उल्लेखनीय हैं।
ऋगवेद का हिन्दी में अनुवाद कर ना केवल वेद का उद्घार किया बल्कि हिन्दी भाषा को भी शक्ति दी। उस समय के लिए ये अत्यंत कठिन काम था, लेकिन जिस सहजता से इस काम को पूरा किया गया उसे इसके मर्मज्ञ ही समझ सकते हैं।
उन्होंने दो उपन्यास लिखे- अतृप्त और दो दिनों की दुनिया। ये दोनों उपन्यास हिन्दी प्रचारक पुस्तकालय वाराणसी और चौखम्बा प्रकाशन वाराणसी से प्रकाशित हुए। घटना की रोचकता और भाषा की प्रांजलता इसके प्राण हैं। उनकी कहानियां और कविताएं सामयिक पत्रिकाओं में खूब प्रकाशित हुईं। कल्याण के नारी अंक में भी आप साहित्याचार्य ‘मग’ नाम से लेख देख सकते हैं।
पटना से प्रकाशित नई धारा पत्रिका थे रामवृक्ष बेनीपुरी। बेनीपुरीजी के आग्रह पर बाबूजी ने दो लेख भेजे जिसे संस्कृतज्ञों ने बहुत सराहा। प्रफुल्ल चंद्र ओझा ‘मुक्त’ पटना आकाशवाणी में हिन्दी वार्ता के निदेशक थे। ‘मग’ जी की विद्वता से प्रभावित होकर उन्होंने आकाशवाणी पटना के लिए अनुबंधित किया। चूंकि गांव में एक ही रेडियो सेट था तो आकाशवाणी से जब उनकी वार्ता प्रसारित होती तो उसे सुनने के लिए रेडियो सेट के इर्द-गिर्द भीड़ लग जाती थी। ऐसा था लोगों के दिलों पर बाबूजी का असर।
तारापुर के आदर्श विद्यालय में तुलसी जयंती और विद्यापति जयंती की परंपरा बाबूजी ने शुरू की थी। जब भी तुलसी जयंती, विद्यापति जयंती मनाई जाती तो वो बाबूजी के सभापतित्व में ही होता। बापूजी यानी ‘मग’ जी की मौजूदगी की वजह से ऐसे आयोजनों में कभी श्रोताओं की कमी नहीं रही।
उन दिनों ये चर्चा थी कि रामवृक्ष बेनीपुरी के ठहाके का कोई जोड़ नहीं था। जब साहित्यकारों के बीच बेनीपुरीजी बोलते तो हंसी का फव्वारा फूट पड़ता। ठीक वैसे ही ‘मग’ जी का भी मिजाज था। पहनावा उहनावा तो उनके पास कुछ नहीं था। सिर्फ दो मीटर कपड़े का पुतला बनाकर लपेटे रहते। लेकिन इस पर किसी का ध्यान नहीं जाता। ध्यान जाता तो सिर्फ उनकी विनोदप्रिय बातों पर। उनके सामने जो भी रहता हंसते-हंसते लोटपोट हुए बिना नहीं रहता। बातों में सबका मन बहलाए रहते थे बाबूजी।
उनके सामने ना तो कोई समस्या लेकर आता और ना ही उनके पास अपनी कोई समस्या थी जिसका रोना वो दुनिया के सामने रोते। उनकी जीवन तो फकीर की तरह था। खेत की मेड़ पर जनपाट को उन्हीं की बोली में रिझाते तो चाहे काशी के धुरंधर पंडित हों या तिलडिहा के स्वर्गीय पंडित श्यामाकांत झा हों अथवा वहां के ही प्रकांड उद्भट विद्वान श्री उदयकांत झा- उनसे उन्हीं की तरह ओजपूर्ण बातें करते। साहित्याचार्यों की महफिलों में वो स्वनिर्मित श्लोक सुनाते लोगों को विस्मित कर देते।
मैंने कहा ना गंगा की धारा अवरुद्ध हुई तो साहित्य से इन्होंने खुद को अलग कर लिया। इन्होंने आयुर्वेदाचार्य की डिग्री काशी से ली और आयुर्वेदिक चिकित्सा में लग गए। लेकिन इसमें भी पैसा कमाना इनका उद्देश्य नहीं था। उन्हें चिंता बस गरीबों की सेवा की थी।
‘मग’ जी के पिता यानी मेरे दादा श्री लक्ष्मीनारायण मिश्र भागलपुर कचहरी में नाजिर थे। उनका और फिर उनके बाबा यानी मेरे पड़बाबा श्री बुलाकीलाल मिश्र का निधन थोड़े अंतराल में हो गया। बड़ों का साया सिर उठने से घर की जिम्मेदारी उनके कंधों पर आ गई। मजबूरी में खेती जैसे गार्हस्थ पेशे को संभालना पड़ा। अब साहित्य सृजन में लगन बाबूजी के वश की बात नहीं रह गई। अब तो पानी के लिए आसमान की ओर टकटकी लगाकर देखना ही उनकी दिनचर्या बन गई।
बाबूजी का कहना था कि रामधारी सिंह दिनकर की कविता पहली बार गंगा में उन्होंने ही छापी थी। उसके बाद ही गंगा में नौकरी ढ़ूंढ़ते दिनकरजी इनके ऑफिस आए तो कुछ दिनों सह संपादन का काम उन्होंने किया।
इसी संदर्भ में एक घटना मुझे याद आ रही है। मैं भागलपुर के स्नातकोत्तर अंग्रेजी विभाग में फाइनल ईयर का छात्र था। बाबूजी को दिनकर जी से मिलना था। दिनकर जी उन दिनों भागलपुर विश्वविद्यालय के कुलपति थे। उनको लेकर मैं उनके आवास छावनी कोठी गया। पिताजी का पहनावा देखकर मैं गुस्से में भर गया। मामूली चप्पल, मामूली कुर्ता और धोती। शायद इतने मामूली ढंग से प्रेमचंद भी ना रहते होंगे और प्रेमचंद के साथ तो मजबूरी थी पर बाबूजी के साथ क्या मजबूरी। वो तो जमींदार खानदान से थे। मैं ये सोच-सोच गड़ा जा रहा था क्योंकि मैं सूट कोट और टाई में था। दिनकरजी को एक पुर्जी में ‘मग’ लिखकर भेज दिया था। बुलावा तुरंत आ गया। अंदर की बातचीत मैं कान लगाकर बाहर ही सुन रहा था। दिनकरजी ने कहा-ये कैसा भेष है? ना दाढ़ी बनाया ना ही... बाबूजी ने बीच में ही काटकर कहा-मेरे भेष को छोड़ो तुम शायद भूल गए हो कि सुल्तानगंज घाट के किनारे बैठकर किस तरह मूढ़ी, चूड़ा, घुंघनी खाते थे। और फिर बुलंद ठहाके से कमरा गूंज उठा। दफ्तर के किरानी अवाक थे। ऐसे विचित्र प्राणी से दिनकरजी को मिलते शायद कभी नहीं देखा था। इस असमंजस को दिनकर जी ने तोड़ा और कहा ये मेरे पुराने मित्र हैं और गंगा के संपादक थे। ये साहित्याचार्य ‘मग’ के नाम से जाने जाते हैं। फिर दोनों बाहर आए और मुझे देखकर पूछा कि ये कौन है। जब उनको पता चला कि मैं उनका पुत्र हूं तो कभी मुझे देखा और कभी पिताजी को। यह बतलाना मैं जरूरी नहीं समझता कि उन्होंने क्या समझा। सुविज्ञ को स्वत: ही समझ लेना चाहिए।
उनकी उदारता, दयालुता के बारे में क्या कहूं नजरों के सामने एक दृश्य उभरता है। पूरे गांव में आग लगी थी। सैंकड़ों घर देखते ही देखते खाक हो गए। मेरे घर में भी आग लगी थी। दमकल आया। मेरे घर में ज्यादा आग लगी देख और अधिक क्षति का अनुमान कर दमकलकर्मियों ने पहले मेरे ही घर की आग को बुझाना चाहा लेकिन बाबूजी ने मना कर दिया और गरीबों के झोपड़े में लगी आग पहले बुझाने का निर्देश दिया।
और फिर बगल की गांव के स्कूल के विद्यार्थी जो आग बुझाने आए थे और काफी थक चुके थे उनके खाने के लिए आलू के बोरे निकाल दिए जो आग में पक चुके थे।
अंत में मैं उनके जीवन की प्रेरणास्पद बात की ओर ध्यान आकर्षित करना चाहता हूं। घर का इकलौता बेटा होने की वजह से बाबूजी का लालन-पालन अत्यंत दुलार से हुआ। 15-16 साल तक उन्होंने स्कूल का मुंह नहीं देखा। ससुराल में खिल्ली उड़ी तो चेतना जाग गई। संकल्प के साथ गया के खुरखुरा विद्यालय में अध्ययन किया। फिर काशी जाकर आचार्य की उपाधि ली। इसके बाद तो मानों बाबूजी के सिर पर सरस्वती विराजमान हो गईं। लगन और परिश्रम के बल पर इंसान क्या नहीं कर सकता इसकी मिसाल हैं मेरे बाबूजी।
पैसे से उन्हें कोई मोह नहीं था ना ही चाहत। प्रसिद्धि पाने की अभिलाषा भी उन्हें नहीं थी। वो चाहते अपने बूते बहुत कुछ कर सकते थे। यही वजह है कि उन्होंने अपनी कोई कृति सहेज कर नहीं रखी। अग्निकांड में उनकी सारी रचनाएं स्वाहा हो गईं। अब ये हम लोगों का दायित्व है कि हम उन्हें ढूंढ़ें और उनके कार्यों पर शोध करें। उनकी जब मृत्यु हुई तो उनकी इच्छा थी unlamented let me die.
कहते हैं फकीरों के सेहत की जाम दुनियावी तकलीफों और जिल्लत को मिटाने वाली होती है। किसी फकीर को रास्ते में देखता हूं तो उसी में अपने बाबूजी की सूरत ढ़ूंढ कर सकून पाता हूं।

Sunday, May 23, 2010

छतहार में मुक्तिधाम

जीवन के बाद मौत संसार का सच है। जो आया है उसे एक ना एक दिन जाना होगा। सृष्टि के इस चक्र को कोई नहीं बदल सकता। लेकिन, मौत के बाद क्या? क्या कोई स्वर्ग या नरक है? मरने के बाद कहां जाता है इंसान? ये कोई नहीं जानता, फिर भी इंसान इस कोशिश में लगा रहता है कि मरने के बाद भी उसके बंधु-बांधवों को कोई परेशानी ना हो। इंसानी देह त्यागने के भी उनके अपने शांति से रहे। इसी मकसद के लिए मृत्यु के बाद कई कर्मकांड किए जाते हैं। दशकर्म, श्राद्ध, आदि आदि।
छतहार में सालों में बड़ुआ नदी के किनारे लोग इस कर्मकांड को करते आए हैं। चाहे जेठ की दुपहरी हो या सावन-भादो की बारिश। कभी ये कर्मकांड नहीं रुका क्योंकि जाने वाला कभी कहकर नहीं जाता। सालों से ये जरुरत महसूस की जा रही थी बड़ुआ नदी के किनारे ऐसी छाया हो जिसके नीचे लोग इन कर्मकांडों को निभा सकें। चूंकि बरगद और पीपल के जो पेड़ पहले छाया देते थे, वो बाढ़ की भेंट चढ़ गए, इसलिए सिर के ऊपर छाये की जरुरत शिद्दत से महसूस की जा रही थी। लोगों के इसी कष्ट को दूर करने के लिए छतहारवासी समाजसेवी श्री शारदा चंद्रमोहन सिंह (चांदबाबू) सामने आए। उन्होंने अपने पैसे से बड़ुवा नदी के किनारे राजेंद्र राजेश्वरी मुक्तिधाम बनवाया है। १५ मार्च को इसका पूरे धार्मिक रीति-रिवाज से उद्घाटन हुआ। मुखियाजी श्रीमनोज कुमार मिश्र ने चंद तस्वीरें भेजी हैं। आप भी देखिये।
चांद बाबू, जिनकी कोशिशों से ये संभव हो सका। छतहार को आप पर नाज है।
मुक्तिधाम के उद्घाटन के बाद आयोजित भगवत सुनने पहुंचीं महिलाएं।
राजेंद्र राजेश्वरी मुक्ति धाम में १७-२३ मार्च को आयोजित भगवत कथा में उमड़ी श्रद्धालुओं की
भगवत कथा सुनातीं मशहूर कथावाचिका मानस सुमन।
भगवत कथा सुनातीं मशहूर कथावाचिका मानस सुमन।
राजेंद्र राजेश्वरी मुक्ति धाम की तस्वीरें।

Saturday, May 8, 2010

मुखियाजी का फरमान- हर बच्चा स्कूल जाएगा

छतहार में डुगडुगी बज रही है। मुखियाजी का फरमान आया है कि हर बच्चा स्कूल जाएगा। रमचरणा परेशान है। देवली भी सोच रही है कि उसका बच्चा स्कूल कैसे जाएगा क्योंकि जब बच्चा स्कूल जाएगा तो मजूरी कौन करेगा? मजूरी नहीं करेगा तो पेट कैसे भरेगा?
चिंता वाजिब है। देवली अपने बच्चे को स्कूल कैसे भेजेगी। घर में कुछ खाने-पीने को होगा तब तो बच्चा स्कूल जाएगा। देवली और रमचरणा की चिंता लेकर गांव वाले पहुंच गए मुखियाजी के दरबार में। सिंटू बाबू बोले- मुखियाजी, आपने ये क्या फरमान जारी कर दिया। गरीब का बच्चा कैसे स्कूल जा सकता है? वो स्कूल जाएगा तो उसे खाना कौन खिलाएगा?
मुखियाजी बोले, चिंता के कौनो बात नय छै। सभै इंतजाम सरकार करि दैल्हो छै। सब तोरा सब कै अपनो मन बनाय कैरो बात छै।
सिंटू बाबू पहले कुछ सोचने की मुद्रा में आए, फिर बोल पड़े- कि इंतजाम करलौ छै सरकार ने?
अब मुखियाजी, अंगिका से हिन्दी पर उतर आए। बोले- गरीबों में अपने बच्चों को स्कूल भेजने की मानसिकता तैयार करने के लिए सरकार की तरफ से आंगनबाड़ी कार्यक्रम चल रहा है। इसके तहत गरीबी रेखा के नीचे के छह महीने से तीन साल तक के पंचायत के करीब ढाई सौ बच्चों को (प्रति केंद्र 40 बच्चे, पंचायत में 6 केंद्र हैं) महीने में पूरक पोषाहार यानी सूखा राशन दिया जाएगा। यही नहीं, तीन से छह साल तक की उम्र के 40 बच्चों और तीन किशोरी बालिकाओं को महीने में पच्चीस दिन का पोषाहार यानी खाना दिया जाएगा। मुखियाजी ने बताना जारी रखा। कहा- इंतजाम सिर्फ बच्चों के लिए नहीं है। उनकी मांओं के लिए भी सरकार ने भंडार खोल दिया है। आठ गर्भवती और 8 शिशुवती यानी जिनके बच्चे हैं, उनके लिए भी आंगनबाड़ी योजना में पोषाहार का इंतजाम है। ये तो हुई पोषाहार की बात। आंगनबाड़ी योजना के तहत सरकारी डॉक्टर बच्चों और उनकी मांओं की सेहत का भी ध्यान रखेंगे। समय-समय पर इनके स्वास्थ्य की जांच की जाएगी ताकि पंचायत का कोई बच्चा कुपोषित ना रह जाए।
मुखियाजी बोलते जा रहे थे, गांव बोले टकटकी लगाए उनकी बातें सुनते जा रहे थे। आखिर में मुखियाजी बोले-बोल देवली अपनो बच्चा के स्कूल नया भैजवे। देवली बोली, सरकार जब एतना इंतजाम करलौ छै तो हमरो भी फर्ज बनै छै। हमरो बच्चा भी अब स्कूल जैते। लेकिन, एक बात तो हमरा सबकै नै बतैल्हो। आंगनबाड़ी केंद्र छै कहां? कहां मिलतै राशन-पानी?
मुखियाजी के बोलने के से पहले सिंटू बाबू ने कहना शुरू कर दिया। तो सब गांव में रहै छैं और एतना भी नै मालूम छौ। सुन- समेकित बाल विकास सेवा कार्यक्रम के तहत इस समय छतहार पंचायत में इस समय छह आंगनबाड़ी केंद्र हैं।
1. आंगनबाड़ी केंद्र छतहार दक्षिण टोला, सेविका- श्रीमती रुपम देवी, पिछड़ा क्षेत्र अनुदान निधि से पंचायत द्वारा 3.26 लाख की लागत से भवन का निर्माण.
2. आंगनबाड़ी केंद्र छतहार उत्तर रविदास टोला- वर्तमान में ये सामुदायिक चौपाल में चलता है, सेविका- श्रीमती रंजू देवी
3. आंगनबाड़ी केंद्र सहरोय गोयड़ा टोला अंबा रविदास टोला, सामुदायिक चौपाल में चलता है, सेविका-श्रीमती वीणावादिनी
4.आंगनबाड़ी केंद्र मालडा, सामुदायिक चौपाल में, सेविका- श्रीमती सिंधु देवी
5. आंगनबाड़ी केंद्र, टीना, सामुदायिक भवन में, सेविका-कुमारी गुड़िया
6. आंगनबाड़ी केंद्र, हरिवंशपुर, अपना भवन पिछड़ा क्षेत्र अनुदान निधि से पंचायत द्वारा 3.26 लाख रुपये की लागत से भवन, सेविका, श्रीमती सुप्रिया दास